Shri Rammandir Kavya

श्री राम स्तुति

सब जन सुख दाता,चारों भ्राता,आँगन खेल सुहाए।आश्रम व्रत धारा,कठिन आचारा,विद्या पा घर आए।। गुरु मख रखवारे, ताड़क मारे,ऋषि पत्नी उद्धारी।शिव धनु तोड़ा, नाता जोड़ा, वरी सियाशुभकारी।।पितु वचन निभाए,वनहि सिधाए,लंक जीत घर आए।शोभित सिंहासन,सिय वामासन,राजतिलक मन भाए।। नभ आये देवा,करते सेवा,मुदित पुष्प बरसाए।ब्रह्मा त्रिपुरारी, हुए सुखारी,नारद स्तुतियाँ गाए।।गुरु मात निहारे,मुक्ता वारे,सेवा में सब भाई।हनुमत से पायक,सब

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राम नाम की महिमा

राम की महिमा है न्यारी,राम नाम से कट जाती है।भव विपदा सारी,राम की महिमा है न्यारी। दो अक्षर का नाम राम का,उल्टा सीधा जप लो ।संशय विहग स्वयं उड़ जाता ,मन में निश्चय कर लो ।दयासिंधु हैं कृपासिंधु हैं,दीनन हितकारीराम की महिमा है न्यारी। जैसे सूर्य उदित होकर के,सारा तम हर लेता।सबका पथ आलोकित करता,नई

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जब भी धरती पर पाप और पाखंड अधिक हो जाता है

जब भी धरती पर पाप और पाखंड अधिक हो जाता हैइंशानों में ब्यभिचार रूप धारण करके छुप जाता हैमानवता खोने लगती जब दुष्कर्मों के साये मेंजब नीति और निर्धारण का हर दीप स्वतः बुझ जाता है तब धरती पाप मुक्त करने श्रीराम अवध में आते हैं।।मानवता की रक्षा करने सुखधाम अवध में आते हैं।। जब

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श्री राम

राम सियाराम सियाराम जय जय रामराम बसे है मेरे मन में, तन में, जीवन में,राम बिना है सभी अधूरा, देखो इस जीवन में।राम सियाराम सियाराम जय जय राम, आंजनेय बिन राम अधूरे और राम बिन हनुमान है, जीवन सारा उनको सौंपा पुरुषोत्तम महान है।राम सियाराम सियाराम जय जय राम, पिता वचन का पालन करते, वन

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घनघोर तिमिर का हो वासी

घनघोर तिमिर का हो वासी, पुनि राम स्वधाम पधार रहे।पुनि उत्सव का अवसर आया, पुनि राम ललाम पधार रहे।। पुनि दीप जलाओ हर घर में, मिलकर दरबार सजाओ सब।पुनि घोष करो श्री राम की जय, पुनि आरति मँगल गाओ सब।।वनवास कटा सँताप मिटा, पुनि राम अकाम पधार रहे। घनघोर तिमिर का हो वासी, पुनि राम

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मेरे राम

तुम ही मेरे कृष्ण कन्हैया,तुम ही मेरे राम ।तुम ही बसे हो रोम रोम में,सदा जपूं तेरा नाम।मेरे राम, मेरे राम । माया ने मुझको भरमाया।विषय वासना ने उलझाया।बचा सको तो तुम ही बचा लो,सकल संवारो काम।मेरे राम, मेरे राम। भवसागर में जीवन नैया।तुम ही बन आओ खिवैया।नैया पार लगा दो गुरुवर,मेरे जीवन धाम।मेरे राम,

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जंगल जंगल भटक रहे हैं रघुकुल के दो राजकुंवर

जंगल जंगल भटक रहे हैं रघुकुल के दो राजकुंवर।पूछ रहे हैं वन जीवों से जनक दुलारी गई किधर। पैर खड़ाऊ से वंचित और मुकुट नहीं है मस्तक पर ।वल्कल वस्त्रों में दमके ज्यों स्वर्ण लगा हो पुस्तक पर।राम लखन दोनों के दोनों हमको तो रणधीर लगें।एक हाथ में बाण लिए है एक हाथ है लस्तक

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बुला रही है आज अयोध्या

बुला रही है आज अयोध्या सबको अपने धाम को,दिव्य बन रहा मन्दिर आकरदेखो प्रभु श्री राम को, बहुत दिनों तक अपने रामजीघर का सपना देख रहे थे,पर अपने लोगो मे ही कुछ रोटी उस पर सेंक रहे थे,कोई कहता राम नही थे,ना माने अयोध्या धाम को, दिव्य बन रहा मन्दिर आकरदेखो प्रभु श्री राम को,।।

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राम रस

राम भरत लखन शत्रुध्न।दशरथ के हैं जाए लाल ||औधड़- तड़का मारन राम |अहिल्या – शिला तारण राम।। सीता विवाह करन को गए।शिव-धनु तोड़, परषु-क्रोधित भए ।।चारों भ्रात लेआए रानियाँ।शुभ लगन की पावन घड़ियाँ || सीत लखन संग चले सो वन को ।चौदह बरस कहे दो पल को ।।केवट परम भगत जग देखा।प्रभु की नाव भगत

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