2026-02

संगत और कुसंगत

संगत और कुसंगत सुसंगत से बदलता मनुष्य का व्यवहारकुसंगत कर देती मनुष्य का बंटाधार कुसंगत में रहते हुये भी राम प्रेम में लीनविभीषण का राम प्रेम से हुआ बेड़ा पार वाल्मिकी डाकू से बन गया संत महानसुसंगत से जब हुआ अन्तर्मन पे प्रहार तुलसी पत्नी प्रेम में जा पहुँचा ससुरालरामायण लिख डाली जब पड़ी फटकार […]

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राम आधार हैं राम अंजाम हैं

राम आधार हैं राम अंजाम हैंऔर कुछ भी नहीं राम ही राम हैं भोर में राम हैं शाम में राम हैंइस हृदय में बसे नाम में राम हैं राम को छू शिला भी अहिल्या हुईराम हनुमंत की जिद रहे जादुईराम पूजा सदा राम ही धाम हैंऔर कुछ भी नहीं राम ही राम हैं कर्म में

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आर्यावर्त के राम

आर्यावर्त के राम मर्यादा के पुंज तुम, सनातन का तुम आधार हो, आर्यावर्त की धरती का, तुम ही दिव्य श्रृंगार हो। सरयू की लहरों में गूँजे, सदा तुम्हारी पावन गाथा है, जिसके चरणों में झुकता, संपूर्ण जगत का माथा है। छोड़ सिंहासन सुख, कंटक पथ जिसने चुन लिया,मर्यादा की रक्षा हेतु, वनवास का संकल्प कर

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गीत: अधूरी चिट्ठी

*गीत: अधूरी चिट्ठी* शब्द नहीं थे हाथों में,मन ने फिर भी हाल लिखा,लिखी नहीं थी मैंने चिट्ठी,उसमें खुद ही राम लिखा॥शब्द नहीं थे हाथों में,मन ने फिर भी हाल लिखा,लिखी नहीं थी मैंने चिट्ठी,उसमें खुद ही राम लिखा॥ काग़ज़ मौन, कलम रुकी,आँखों ने एक संवाद रचा,दीप जला और लौ भी काँपी,सुबह ने धीमे अर्थ गढ़ा॥जो

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