*गीत: अधूरी चिट्ठी*
शब्द नहीं थे हाथों में,
मन ने फिर भी हाल लिखा,
लिखी नहीं थी मैंने चिट्ठी,
उसमें खुद ही राम लिखा॥
शब्द नहीं थे हाथों में,
मन ने फिर भी हाल लिखा,
लिखी नहीं थी मैंने चिट्ठी,
उसमें खुद ही राम लिखा॥
काग़ज़ मौन, कलम रुकी,
आँखों ने एक संवाद रचा,
दीप जला और लौ भी काँपी,
सुबह ने धीमे अर्थ गढ़ा॥
जो न बोला, वही कह गया,
अयोध्या नगरी धाम लिखा
लिखी नहीं थी मैंने चिट्ठी,
उसमें खुद ही राम लिखा॥
आस न बाँधी किसी इच्छा की,
न कोई आग्रह, न पुकार की,
मन के भीतर जो ठहरा था,
वही चिट्ठी ने स्वीकार की॥
नाम लिया तो पाप भी उतरा,
साँसों ने इक विश्राम लिखा
लिखी नहीं चिट्ठी, फिर भी
उसमें खुद ही राम लिखा॥
नदी-सा मन बहता रह गया,
किनारा खुद ही मिल गया,
जिसे ढूँढा था शब्दों में,
वो शून्य में खिल गया॥
जो खोया था, अर्थ हुआ,
जो पाया, अंजाम लिखा
लिखी नहीं चिट्ठी, फिर भी
उसमें खुद ही राम लिखा॥
अब न चिट्ठी, न संदेशा
भेजने का कोई प्रश्न रहा,
राम नाम जहाँ ठहर गया,
वहीं ये जन्म पूरा हुआ॥
मन ने जब भी सिर झुकाया,
हर क्षण ने पैग़ाम लिखा
लिखी नहीं चिट्ठी फिर भी,
उसमें खुद ही राम लिखा॥
#आशीष अक्स ‘अनहद’
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