आर्यावर्त के राम
मर्यादा के पुंज तुम, सनातन का तुम आधार हो,
आर्यावर्त की धरती का, तुम ही दिव्य श्रृंगार हो।
सरयू की लहरों में गूँजे, सदा तुम्हारी पावन गाथा है,
जिसके चरणों में झुकता, संपूर्ण जगत का माथा है।
छोड़ सिंहासन सुख, कंटक पथ जिसने चुन लिया,
मर्यादा की रक्षा हेतु, वनवास का संकल्प कर लिया।
शबरी के मीठे बेरों में, था प्रेम तुम्हारा छलकता,
केवट की नाव में भी, मान था तुम्हारा झलकता।
अधर्म के दहन को तुमने, कोदंड धनुष ठाना था,
रावण के अहंकार को, मिट्टी में जो मिलाना था।
अहिल्या का उद्धार किया, पत्थर को भी प्राण दिए,
मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर, मानवता का सम्मान किए।
तुम सत्य का संकल्प हो, शील का प्रतिमान हो,
भारत की धड़कन में, तुम बसते सबके राम हो।
राज-भवन के वैभव से, नंगे पाँव चले वन-धाम तक,
नत-मस्तक है सृष्टि सारी, मंगलकारी राम नाम तक।
कोटि-कोटि कंठों से, गूँजे अमर तुम्हारा नाम है,
आर्यावर्त की पुण्य धरा पर, बसते केवल श्री राम हैं।
महेन्द्र तिवारी
पता: स्थापना अनुभाग, राष्ट्रीय अभिलेखागार, जनपथ, नई दिल्ली- 110001
मोबाइल: 9989703240
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