संगत और कुसंगत
सुसंगत से बदलता मनुष्य का व्यवहार
कुसंगत कर देती मनुष्य का बंटाधार
कुसंगत में रहते हुये भी राम प्रेम में लीन
विभीषण का राम प्रेम से हुआ बेड़ा पार
वाल्मिकी डाकू से बन गया संत महान
सुसंगत से जब हुआ अन्तर्मन पे प्रहार
तुलसी पत्नी प्रेम में जा पहुँचा ससुराल
रामायण लिख डाली जब पड़ी फटकार
कुसंगत में रहकर भी छोड़ो ना प्रभु प्रेम
मन में सुसंगत रहे बदल जायेंगे विचार
सुसंगत से बदलता मनुष्य का अन्तर्मन
कोशिश करे कुसंगति आते नहीं विकार
मिल जाये जीवन में संगत सदगुरू की
बदल जाते है मनुष्य के आचार विचार
सुसंगत ना छोड़िये मिल जाये गर साथ
सुसंगत ही करेगी दुनियां से बेड़ा पार
स्वरचित व मौलिक
© पूरनभंडारी सहारनपुरी
