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रस्ता देखूं दशरथ नंदन

गीत रस्ता देखूं दशरथ नंदनसिय राम लखन अभिनंदन। राम राम मैं गाता जाऊंमन मन में मुस्काता जाऊं।राह में तेरे फूल बिछाऊंराह से शूल हटाता जाऊं।।राम राम का करूं मैं वंदनसिय राम लखन अभिनंदन। दर्शन पाकर धन्य हुआझुककर चरणों को छुआअंतर्मन गदगद ही होतारोम रोम पुलकित हुआ।कृपा करना ही रघुनंदन।सिय राम लखन अभिनंदन। जब जब भटके […]

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युग पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम

श्री राम ~~~~~~~~~~~ युग पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते श्री राम ,लक्ष्मी विष्णु अवतार ले आए , बन सियाराम ।अधर्म नाश व धर्म संस्थापना को आए श्री राम ,मानव मात्र के आदर्श स्थापित हुए सियाराम ।। माता -पिता की वचन पालना करते श्री राम ,भाइयों से असीम अनुराग रखते श्रीराम।एक -पत्नि व्रत धारण करते श्री राम

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इस कलियुग में रामचरित

गीत इस कलियुग में रामचरित मानस वरदाई हैतुलसी का ये महाकाव्य चिन्तन सुखदाई है प्राण जाएं पर वचन न जाए रघुकुल ये सिखलाएपरपीड़ा को अपनी मानों मर्यादा सिखलाएसच्चाई की राह चले अपने रघुराई हैंतुलसी का ये महाकाव्य……. प्रीत प्यार के भाव लिए है आदर्शों का दर्पणभाई का है त्याग और सीता का प्रेम समर्पणवैभव सुख

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भरत मिलाप

भरत मिलाप प्रभु श्री राम कीयाद में काट तो लियाभरत ने चौदह वर्ष का वनवास । आने की खबर सुनभरत को अब एक-एक पल लगें चौदह वर्ष समान । लिया प्रण भरत ने कित्याग दूंगा प्राण अगरप्रभु ने देर की अब। तभी हनुमंत प्रकट हुए और बोले ….जिनके विरह में तडपते है दिन-रात आपवो प्रभु

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हूं तो एक मिट्टी का कुल्लड, मैं सोने सा खरा नहीं,

हूं तो एक मिट्टी का कुल्लड, मैं सोने सा खरा नहीं, प्रभु राम पे कुछ लिख पाऊँ , मैं इतना भी बडा नहीं ।राम पे फिर भी छन्द बनाए, बात पे अपनी अडा नहीं,क्षमा करे मुझको रघुराई, तुम सा चरित्र भी गढा नहीं ।राम पे कुछ लिखने से पहले, तप असाध्य करना पड़ता ,मैं ऐसा

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दीपमाला सरीखे प्रखर आ गये

सादर प्रणाम् 🙏 दीपमाला सरीखे प्रखर आ गयेसीख सब-कुछ गुरू से संवर आ गयेयुद्ध कौशल या संगीत का मर्म होतपते सोने से कुंदन निखर आ गये सिंह जैसे प्रबल बाल पुंगव कठिनधर्म संयम के पर्वत शिखर आ गयेलक्ष्य कंटक हुए आज उपवन के सबगीत गाते हुए दो भ्रमर आ गये विप्रजन से सुसज्जित सभागार मेंशास्त्रज्ञानी

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सीता के मनोभाव

सीता के मनोभाव है मुझे संज्ञान राम मन अछोह है नहीं।पूर्ण समर्पण है प्रिय यह बिछोह है नहीं। डोले अयोध्या की नाव तुम ही कर्णधार हो ।वे तुम्हारे प्राण तुम ही प्राणों का आधार हो।मन तपस्वी हंस सा है कोई गोह है नहीं ।पूर्ण समर्पण है प्रिय यह बिछोह है नहीं। है मुझे संज्ञान राम

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जब अयोध्या झिलमिलायी दियो से

जब अयोध्या झिलमिलायी दियो से झिलमिल तारों सी,उर्मिला के अचेत मन को मिल गयी संजीवनी। मन के सूने गाँव में दिए हज़ारो जल गए,बिरहा की होली जली और यूँ दिवाली हो गयी। एक तरफ तड़पे है केकई बावरी से घूमती,एक तरफ है मंथरा निरभाग खुद को कोसती,अपने अपने हिस्से के संताप सबने सह लिए,बिरहा की

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