अयोध्या की छवि निराली है

इस कविता में देखिए कैसे अयोध्या वासियों के साथ-साथ देवता और प्रकृति भी *रामलला के जन्म* की खुशियां मना रहे हैं.
इस कविता की विशेषता है कि इसमें हिंदी के सभी वर्ण- स्वर और व्यंजन क्रम से तो आए ही हैं, पांचो वर्ग (कचटतप) भी अलग-अलग, एक दृश्य का वर्णन करते हैं

*अ* योध्या की छवि निराली है, *आ* ज जन्मे हैं श्री राम
*इ* ठलाते सब पुरवासी देख,*ई* श छवि मोहक मुस्कान ।

*उ* स रूप के *ऊ* पर बलिहारी हैं,
*ए* क एक अठखेली प्रभु की,*ऐ* सी मोहक प्यारी है।

*ओ* ट मे चंदा बादल के, *औ* र टिम टिम तारे मुस्काते हैं
*अं* ग अंग मे सौ सौ सूरज, *अः*! प्रभु कितने सुहाते हैं ।

*क* ल कल करती नदियां हो या, *ख* ग मृग चहकते बागों में ,
*गा* रहे गुणगान सभी, *घ* र घर सुंदर रागों में।

*च* हुँ ओर उड़े चंदन कुमकुम, *छ* म छम खुशियां आई हैं
*ज* ल थल नभ मे देखो कैसे, *झू* म झूम मुस्काई हैं ।

*ट* कटकी लगाकर देखें गोरी, *ठि* ठक निहार रह जाती हैं ,
*ड* गर प्रीत की मतवाली, *ढ* क आंचल दूध पिलाती हैं।

*ति* लक अक्षत चंदन फूल, *था* ली सजा के लाए हैं ,
*दे* खो आज तो, *ध* रती पर, *न* भ से शिव भी आए हैं ।

*प* रकोटों पर ध्वजा पताका, *फ* र फर तोरण चमकीले हैं
*बा* जे इत उत ढोल नगाड़े, *भे* री दुदुंभी शंख ध्वनि, *मृ* दंग मंजीरे सुरीले हैं।

*य* हाॅ वहाॅ पथ गली चौबारे, *र* त्न मणि माणिक मोती, *ले* ले लोग लुटाते हैं ,
*वा* री जा अद्भुत छवि पर, *शी* श प्रभु को नवाते हैं

*ष* ट रस सरस श्रृंगार करे, *सु* भग स्वरूप मन भाता है
*ह* रि दरश, *क्ष* ण भर में ही, *त्रि* लोक सुख औ, *ज्ञा* न परम दे जाता है.
🙏

(स्वरचित)
डॉ नीता सरोजनी
कानपुर, उत्तर प्रदेश
भारत