अवध में राम पधारे थे,
लहर खुशियों की छाई थी।
सलोना देख कर मुखड़ा,
आंख मां की भर आईं थी।।
स्वर्ग से खुश हो देवों ने,
पुष्प उन पर बरसाए थे।
सभी के मन हर्षाए थे,
पिता फूले ना समाए थे।।
ना रघुवर सा हुआ बेटा,
ना उन जैसा है अब भाई।
नहीं ढूंढे मिले तुमको,
रघुनंदन सा रघुराई।।
बने वो त्याग की प्रतिमा,
हर कर्तव्य निभाएं थे।
वचन निभाने की खातिर
राज्य त्याग आए थे।।
रहे वर्षों भटकते वो
दिलों पे राज थे जो करते ।
किसी को दर्द पहुंचाए,
ना ऐसा काज थे करते ।।
दीप्ति गुप्ता’दीप’
फर्रुखाबा
