क्यूँ थका बटोही राम डगर पर

 

क्यूँ थका बटोही राम डगर पर,
पग-पग मोती मिलते हैं
राम चिरंतन भजन श्रवण से
आत्म दीप नित खिलते हैं।

1.अंबर के आंचल में प्रतिपल
वरद-वरद घन पलते हैं.
पृथक, सतत, नित सत्य कर्म से
अनुभव सेतु बनते हैं,
क्यूँ थका बटोही राम डगर पर,
पग-पग मोती मिलते हैं।

2.ज्ञान रतन धन पावन जल से
सीप में मोती बनते हैं..
पवन वेग से कल-कल झरने
पत्थर में पथ चुनते हैं,
क्यूँ थका बटोही राम डगर पर,
पग-पग मोती मिलते हैं।

3.गंगा की अमृत धारा में
स्नेह दीप धृत जलते हैं
दृढ़ निश्चय की अगम ध्वजा से
आयाम नित्य नव खुलते हैं,
क्यूँ थका बटोही राम डगर पर,
पग-पग मोती मिलते हैं ।

कविता अदलक्खा