भू_सुता जगजननी सिया जी

*भू_सुता जगजननी सिया जी*

प्राण प्रिया श्री राम सिया की,
हम यह कथा सुनाने आए हैं।
जगजननी की करुण कथा से
नयनों ने अश्रु छलकाए है।।

विदेहराज नृप जनक कुमारी,
सीता सीत (हल)से जन्मी थी।
मां सुनयना की भरने सूनी गोदी,
भू कन्या बन अवतरित हुईं थी।।

दिव्य रूपिणी, दिव्य परम ये,
थी पूर्ण दिव्यता का अवतार।
पांच वर्ष की बाल आयु में ही ,
लिया शिवधनु करतल में धार।।

देख दृश्य यह अद्भुत अलौकिक,
की पितु जनक ने यह प्रतिज्ञा।
वहीं वीर बने सिय का स्वामी,
सहज उठा ले जो शिव धनुषा।।

हरि रूप तब श्री राम लला ने,
सहज ही शिव धनु को तोडा।
और विदेह राज की अँगनाई में,
सियजी संग था नाता जोड़ा।।

सती रूपिणी पतिव्रता सिया ने,
सहज स्वीकारा वन का गमन।
अग्नि प्रवेशा हुईं वन में सिया जी,
छद्म रूप का किया रावण ने हरण।।

तेज पुंज मय मातु सिया को,
तनिक भी न छू पाया रावण।
शत्रु के उपवन में भी सिया जी,
करती रहीं एक तृण से रक्षण।।

पुनः देने निज चारित्रिक प्रमाण,
अवध गमन पूर्व दी अग्नि परीक्षा।
स्वर्ण रूप थी देवी सिया साध्वी,
अग्नि से निकली कर अग्नि प्रदिक्षा।।

भू कन्या इन भूमिजा देवी पर,
अवधवासियों ने किया दोषारोपण।
वनदेवी हुई पुनः वन की गामिनी,
जब दो सुत थे उनके गर्भाधारण।।

ऋषि आश्रम में दे लव कुश को जन्म,
पुनः समा गई वे वसुधा की गोद।
ये कही उनकी अति छोटी सी कथा,
पर है ये गहरी, हो जितना शोध।।

ये सनातन सत्य भूमि भारत की,
जहां नारियां करें धर्म पथ चयन।
इनसे ही जन्में ध्रुव,प्रहलाद, भरत,
नमन करें इनको कोटि कोटि नमन।।

ममता श्रवण
अग्रवाल