शिला
गौतम ऋषि का आश्रम आज भी मौन है।
मौन… वैसा ही मौन, जैसा सदियों पहले अहिल्या पर उतारा गया था। अहिल्या! एक अति सुन्दर स्त्री, निर्मल, प्रतिभाशाली
पर जब छल हुआ, तो दोष उसका नहीं था
फिर भी श्राप उसी को मिला
उसने एक क्षण में सब कुछ खो दिया
अपना स्वर, अपना सम्मान, अपना अस्तित्व।
वह जीवित थी, सांस ले रही थी,
पर समाज की नज़रों में वह पत्थर हो चुकी थी।
लोग कहते “यह शिला है।”
ऋषियों की निगाहें भी दया से ज्यादा तिरस्कार से भरी रहतीं।
अहिल्या भीतर ही भीतर पूछती
“क्या सचमुच दोष मेरा था?
क्या स्त्री होना ही इतना बड़ा अपराध है?”
दिन बीतते गए, ऋतुएँ बदलती रहीं।
आश्रम में यज्ञ हुए, ऋषियों ने शास्त्रों पर चर्चा की, पर अहिल्या वहीं पड़ी रही!
मौन, उपेक्षित, जैसे जीवित होकर भी मृत
सिर्फ़ एक प्रतीक्षा में कि कोई आएगा, जो उसे जड़ से जीवंत बना देगा।
और एक दिन, वह आए!
राम
उनके चरणों का स्पर्श हुआ तो मानो
बरसों से जमी धूल अचानक उड़ गई
राम ने कोई चमत्कार नहीं किया
उन्होंने न मंत्र पढ़े, न शाप तोड़ने का दावा किया। उन्होंने बस उसकी ओर देखा
एक ऐसी दृष्टि से जिसमें तिरस्कार नहीं,
बल्कि स्वीकार था
अहिल्या की आँखें छलक पड़ीं
बरसों बाद उसने अपने भीतर जीवन की धड़कन सुनी।
राम की मौन स्वीकृति ने कहा
“तुम निर्दोष हो!
तुम शिला नहीं, तुम स्त्री हो, जीवित, गरिमामयी और पवित्र”
वह उठ खड़ी हुई।
पत्थर से स्त्री बन गई।
यह वही क्षण था,
जब एक स्त्री को उसकी पहचान लौटा दी गई
राम केवल ईश्वर नहीं बने,
बल्कि वे पहले इंसान बने
जिन्होंने उसे सचमुच देखा… सचमुच!
