अशोक वाटिका में सीता

अशोक वाटिका में सीता :-

कैसे धरूँ मैं धीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर
याद तुम्हारी मोहे तड़पावे
आ जाओ रघुबीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

तुम बिन राघव चित न लागे
पथराए नैना ये जागे
पाँव पड़ी ज़ंजीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

राह तुम्हारी देखूं निस दिन
नैन मेरे अब काजल के बिन
केश खुले हैं रघुबीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

तुम बिन राघव चैन न पाऊँ
किस को अपनी पीर सुनाऊँ
नैनन भर आवे नीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

जल बिन मछली तड़पे जैसे
तुम्हरे दरस को तरसूं ऐसे
का से कहूँ मैं पीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

रावण आवे मोहे सतावे
नित नए वो भय दिखलावे
ले लेकर शमशीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

लखन लाल को ताने मारे
विष के जैसे तीर हों सारे
लाँघि उनकी लकीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

१३ बरस बन बन हम भटके
कैसी अब विपदा में अटके
कहाँ ले आई तकदीर
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!

एक मास जो तुम न आए
सीता की सुध न ले पाए
समाऊं अग्नि बीच
नाथ अब कैसे धरूँ मैं धीर..!!
© डॉ नीलम ‘बावरा मन’
नई दिल्ली