*श्री राम*
आंख बंद करती हूं तो उन्हें ही समक्ष पाती हूं।
रामभक्ति बिन मैं बड़ी असहाय सी हो जाती हूं।
मेरे मन मंदिर में उनका ही प्रकाश चमकता है।
मेरा सम्पूर्ण जीवन उनके प्रभाव से महकता है।
बड़ी हुई हूं मैं उन्हीं की कथाएं सुन सुन कर।
जीवन डोर बुनी उन्ही के आदर्श चुन चुन कर।
मर्यादित रखू अपने को, कोशिश तो पूरी है।
उनकी अराधना बिना, ये ज़िन्दगी अधूरी है।
राम का नाम जपूं सुबह-शाम,राम मेरे आराध्य हैं।
हर राह रोशन है उनसे, वो मेरे जीवन के साध्य है।
पिता को पिता माना और, मां को माना उन्होंने मां।
भाईयों से इतना प्रेम करें, कि बसे उनमें उनकी जां।
प्रजा बीच रहे ऐसे, कि उन सबके सुख-दुख जान लिए।
उनकी क्या है ज़रुरतें, उनके बिन कहे पहचान लिए।
बेटा है,भाई है,बंधू है, और सखा भी बहुत ही प्यारे हैं।
कोशल्या की आंख के तारे, वो दशरथ के राजदुलारे है।
पुर्वजों के आदर्श उनके आधार, रघुकुल के हैं वो सरताज,
गुरूकुल की मर्यादा सहते, है गुरूयों को भी उन पर नाज,
मां सीता जिनकी सहचरी,भाई लक्ष्मन बना सजग प्रहरी,
भरत के लिए वो है तनप्राण, शत्रुघ्न के वो तरकश बाण,
राम नाम है सांस मेरी, राम संग बंधी जीवन डोरी,
उठती हूं तो बोलूं राम, राम नाम से दिन के काम,
ठोकर लगे राम पुकारूं, खुशियों में भी राम उचारूं,
राम नाम से, सब चले सुचारू-
राम नाम से, सब चले सुचारू-
सरोज कुमार ‘श्वेता’
आचार्य निर्मल
(कवि एवं साहित्यकार)
मथुरा उ० प्र०
9258812772
