राम गमन पथ यात्रा (कविता)
जब वन को चले थे राम,त्याग कर सुख साधन के धाम
प्रकृति मुस्कुराई ,धन्य रघुराई !
जटा जुट को मुकुट विराजे,केसरिया या के भाल पे साजे ,
धारण वल्कल वस्त्र, हाथ में शास्त्र,
संग में, जानकी माई चले, पीछे लक्ष्मण भाई
संग भवरे गुन गुनजार करे,और ठंडी सुगंधित वियार चले,
गावे मोर पपीहा वन में, कोयल मीठी तम भरे,
पथरीली ताप्ती पगडंडी, कोमल चरण रघुराई,
कहीं बदली सी है छाई
ऋषि मुनियों का सम्मान करें, और असुरों का संहार करें,
केवट की नाव चढ़े स्वामी, और गंगा तट को पार करें,
शबरी के झूठे बेर ये खावे फेर,
के शरणागत की शरण पाइ के नवधा भक्ति फिर गाई,
सुग्रीव, जावंथ, नील और न,ऋषिमुख पर्वत पर निवास करें,
बाली, के डर से छुपते फिरे,कहीं निर्जन वन की तलाश करें,
कहीं कोई गुप्तचर है भाई,हनुमत पता लगा जाई,
लंका में, रावण मारा था,आता ताई, संहारा था,
लिया राम, ने यूंही अवतारा था,धरती का भार उतरा था,
किया, लंका को विध्वंस, करें निर्वंश, चहुं और शांति है छाई।
धन्य है रघुराई, जब वन को चले थे राम।
