राम का सुमिरन करो (हरि गीतिका छंद)

राम का सुमिरन करो (हरि गीतिका छंद)

मन हो रहा व्याकुल कभी जो, राम का सुमिरन करो।
हरते सभी वे कष्ट जन के, तुम किसी से मत डरो।।
हनुमान जैसे भक्त बन कर, छवि हृदय में तुम धरो।
फिर दरश श्री रघुनाथ के हों, जन्म मनु सार्थक करो।।

मन हो रहा व्याकुल कभी जो, राम का सुमिरन करो….

पाषाण रूपा हो अहिल्या, राह हर पल देखती।
श्री राम आएँ तारने को, सोच सब दुख झेलती।।
कैसा मिला है भाग्य उसको, वह सदा थी कोसती।
उद्धार होता राम रज से, भाग्य शुभ अब सोचती।।

मन हो रहा व्याकुल कभी जो, राम का सुमिरन करो….

श्री राम को जो पूजते वे, भाग्य के होते धनी।
जूठे खिलाए बेर चख कर, भक्त वह शबरी बनी।।
श्रीराम का परिवार मंदिर, बीच में रखना सदा।
यह राम नवमी पर्व देता, हर्ष सह सुख संपदा।।

मन हो रहा व्याकुल कभी जो, राम का सुमिरन करो….

डॉ कविता सिंह ‘प्रभा’, दिल्ली