**श्री राम**
सोलह दिव्य कलाएं है,
मेरे प्रभु श्री राम में।
मन में एक शान्ति का सागर,
मिले अयोध्या धाम में।।
उत्तम गुणों से युक्त थे जो,
पराक्रमी और तेजस्वी।
धर्म के मर्म के ज्ञाता थे वो,
कृतज्ञ और थे ओजस्वी।।
सत्य का हर पल पालन करते,
संकल्प विचारों के थे पक्के
सीरत के जो बड़े धनी थे,
प्राणी हित के थे वह सच्चे।।
ज्ञानी थे प्रभु राम हमारे,
सक्षम थे हर कार्य में।
सुंदर और मनमोहक छवि थी,
आत्मसंयमी वह आर्य थे।।
क्रोध को बस में करने वाले,
कान्तिवान ओजस्वी थे।
भयरहित सब देव थे,
वो पराक्रमी राजस्वी थे।।
स्वरचित**
रेखा शंखवार “स्मृति”
उत्तर प्रदेश
