श्री राम
कण – कण में राम
क्षण- क्षण में राम
हैं राम बसे मन- मन में हैं!
हैं मर्यादा में सजते राम
सीता के बिन न जचते राम
बिन लक्ष्मण के हैं अधीर राम
सरयू की धार में दिखते राम!
हैं त्याग तपस्या के साधक
हैं सृष्टि के कर्ता कारक
हैं वचनवद्व दशरथ के सुत
रामा हैं अहंकार के दाहक!
पिता की आज्ञा सिर धारे
थे लक्ष्मण के भाई प्यारे
स्वयं धर्म की रक्षा हेतु
लंकापति लंका में मारे
हैं प्रलय -विलय में रामा
दिग के आँचल में हैं रामा
जो हृदय से राम नाम ले ले
उसे राम ने प्रेम से है थामा!
स्वरचित
डॉ. मधु कैथवार
फतेहगढ़ फर्रुखाबाद
