सिय संग हिय पधारों राम
तन अवध मन मारो अयोध्या.
सिय संग हिय पधारों राम.
दूषित मन के दूषन मारो.
छल-कपट के खल निवारो.
मन के सब संत्रास मिटाकर.
कर दो पावन मारो काम.
सिय संग हिय पधारों राम.
काम क्रोध तो सर चढ़ बैठा.
लोभ मोह ने जकड़ा ऐसा.
बना सिला मै अहिल्य सरीखा.
रज पग से अब तारो राम.
सिय संग हिय पधारों राम.
दौड़ रहा है तृष्णा मन में.
ज्यो मारीच दौड़ा था बन में.
कुम्भकर्ण सा बढ़ता जाता.
इसको भी संहारो राम.
सिय संग हिय पधारों राम.
अहंकार चीत्कार रहा है.
रावण सा ललकार रहा है.
बीच भवंर में फंसी मर्यादा.
तुम्ही एक सहारो राम.
सिय संग हिय पधारों राम.
मुकेश श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
