राम मेरे लौट आओ-
सूनी सूनी तन की नगरी राह तकती मन की शबरी
कष्ट पीड़ा सब मिटाओ राम मेरे लौट आओ
राम मेरे लौट आओ।।
देखो अब कितनी अहिल्या मोम से पत्थर बनी हैं।
बिन तुम्हारे उनकी पीड़ा कब कहाँ किसने सुनी है।
वीतरागी हो रहा मन ज्ञान की गंगा बहाओ ।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
लुट रही मन की अयोध्या धर्म का न मर्म कोई।
मिट चले नैतिक नियम सब आज मानवता है सोई।
जी उठे तप त्याग फिर वैराग्य की महिमा सुनाओ।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
और कब तक जानकी वनवास में विरहा सहेगी।
अपने मन की वेदना और दर्द को किससे कहेगी ।
फिर जगाने भाव मन के मान मर्यादा निभाओ।।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
भूमि संस्कारों की ऊसर हो चली है।
आह पीड़ा वेदना मन में पली है।
आहटों पर आगमन का बोध लाओ।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
सूनी सूनी तन की नगरी राह तकती मन की शबरी
कष्ट पीड़ा सब मिटाओ राम मेरे लौट आओ
राम मेरे लौट आओ।।
देखो अब कितनी अहिल्या मोम से पत्थर बनी हैं।
बिन तुम्हारे उनकी पीड़ा कब कहाँ किसने सुनी है।
वीतरागी हो रहा मन ज्ञान की गंगा बहाओ ।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
लुट रही मन की अयोध्या धर्म का न मर्म कोई।
मिट चले नैतिक नियम सब आज मानवता है सोई।
जी उठे तप त्याग फिर वैराग्य की महिमा सुनाओ।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
और कब तक जानकी वनवास में विरहा सहेगी।
अपने मन की वेदना और दर्द को किससे कहेगी ।
फिर जगाने भाव मन के मान मर्यादा निभाओ।।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
भूमि संस्कारों की ऊसर हो चली है।
आह पीड़ा वेदना मन में पली है।
आहटों पर आगमन का बोध लाओ।
राम मेरे लौट आओ राम मेरे लौट आओ।।
