हे राम! तुम्हारा वंदन है

हे राम! तुम्हारा वंदन है

धूप दीप से थाल सजाया जिसमें रोली कुंकुम चंदन है।
देवों की इस पुण्य धरा पर फिर से राम तुम्हारा वंदन है।
हे राम! पुनः तुम आकर देखो
स्नेह लक्ष्मण- सा नहीं दिखता
चरण पादुका सिर रखने वाला
भाई भरत- सा नहीं दिखता
पवित्रता कहाँ अब सीता जैसी
शबरी – सा प्रेम नहीं दिखता
मित्रता कहाँ सुग्रीव के जैसी
हनुमत- सा वीर नहीं दिखता
अब अत्याचार है असुरों का जग में क्रंदन ही क्रंदन है।
देवों की इस पुण्य धरा पर फिर से राम तुम्हारा वंदन है।

बहुत अपकर्ष हुआ धर्म का
पाप का उत्कर्ष दिखाई देता है
मानवता है शर्मसार
हाथ में हथियार दिखाई देता है
तुमसे पूछ रहा हूँ हे रघुनंदन !
इस पुण्य धरा का क्या होगा
वर्चस्व बढ़ेगा असुरों का
या उदय तुम्हारा फिर होगा
शान्ति स्थापनार्थाय किस धर्म – युद्ध का स्पंदन है।
देवों की इस पुण्य धरा पर फिर से राम तुम्हारा वंदन है।
राम कुमार प्रजापति
अलवर,राजस्थान