भक्ति गीत
जन-जन मन में दीप जला कर,
राम नाम उजास भरो।
भाव-भरी जीवन नौका को,
हे रघुनंदन पार करो।।
मोह माया काँटे पथ बिखरे,
मन भरमा जाता है।
राग द्वेष से भरा हृदय मम, लोभी हो जाता है।
सत्य-धर्म की राह दिखाकर,संशय मेरे सभी हरो।
भाव-भरी जीवन नौका को,
हे रघुनंदन पार करो।।
दुख की रेखा, संशय-छाया,
सब तुम ही हरते हो।
चरण कमल की छाँव बिठा,
सब कुछ तुम ही करते हो।
क्लांत हुए जर्जर तन मन को, प्रभु दे दो विश्राम अहो।।
भाव-भरी जीवन नौका को,
हे रघुनंदन पार करो।।
ताप-तृषा से जलता जीवन,
शीतल कर दो राम सखा।
नाम राम की लगे रटन मन,
भक्ति का वो स्वाद चखा।
लगे निरर्थक दुनिया सारी,
राम नाम बस लगे खरो।
भाव-भरी जीवन नौका को,
हे रघुनंदन पार करो।।
मर्यादा के धाम,संजीवक,
पालनहारे तुम जग के।
सजग रहें अविराम निरंतर
कभी न मन मेरा भटके।
राम नाम का मीठा अमृत
पी कर कभी भी नहीं डरो।
भाव-भरी जीवन नौका को,
हे रघुनंदन पार करो।।
सुमिरन से ही सधे सभी के,
बन जाते सब बिगड़े काम।
राम कृपा जिस पर हो जाती,
बन जाते वो सब धनवान।।
पशुवत चंचल होते मन को
कहो व्यर्थ मत भटक चरो।
भाव-भरी जीवन नौका को,
हे रघुनंदन पार करो।।
राम अनुग्रह पाकर पत्थर,
पानी में तर जाते हैं।
दया, क्षमा, सेवा रघुपति गुण,
प्रेरक बन सिखलाते हैं।।
त्याग सभी कुछ नाम शरण ले
बिना प्रयास के जगत तरो
भाव-भरी जीवन नौका को,
हे रघुनंदन पार करो।।
शकुंतला मित्तल
