वन-वन भटकते राम खड़े, नयन भरे अश्रु धार

वन-वन भटकते राम खड़े, नयन भरे अश्रु धार,
सीता बिन सूना हर क्षण, सूना सारा संसार।
हर पेड़ से वो पूछ रहे, “देखी क्या तुमने जानकी को ?”
पत्तों की सरसराहट बोली, “हम भी तरसे उस रानी को।”
हर डाली से झुककर बोले, हर फूलों से की पुकार,
“बतला दो पता मेरी प्राणप्रिया का, कहाँ छुपा है उनका प्यार?”
नदियों की लहरों से पूछा, पर्वत से की गुहार,
हर कण-कण से राम ने माँगा, सीता का समाचार।
पंछी भी मौन बैठे, मानो दुख में डूबे हों,
जंगल के हर जीव लगे, जैसे अपनों से रूठे हों।
“हे हिरण, हे कोयल, हे मृगनयनी, कुछ तो कहो तुम आज,”
राम की व्याकुल आँखों में, था केवल विरह का साज।
धरती भी चुप, अम्बर भी चुप, चुप था सारा धाम,
सीता के बिन जैसे थम सा गया हो राम।
हर श्वास में बस एक ही नाम, हर धड़कन में सीता,
ढूंढते-ढूंढते वन में गूंजे , “सीता… सीता… सीता…”
अशोक वाटिका की छाँव तले, बैठी जनकदुलारी,
आँखों में सावन भरे हुए, मन में पीर अपारी।
चारों ओर अनजाने चेहरे, कठोर पहरेदारी,
राक्षसी निगाहों के बीच, खोई सी वो नारी।
ना सखा, ना अपना कोई, ना ही राम सहारे,
सिर्फ स्मृतियों के दीप जले, मन मे है अंधियारे।
हर पल राम को याद करे, हर श्वास में उनका नाम,
सूने हृदय में गूंज रहा, “कब आओगे राम?”(2)
अशोक वाटिका भी रो पड़ी, सुनकर उसकी व्यथा,
हर पत्ता जैसे कह रहा, “बस थोड़ी और प्रथा।”
प्रेम, धैर्य और विश्वास की, वो बनी मिसाल,
सीता के मन में बस एक राम का ही ख्याल।
रावण के भय, तानों के बीच, अडिग उसका मान,
मन ही मन कहती रही, “आएंगे मेरे राम।”( 2)