राम ही सर्वत्र है

“राम ही सर्वत्र है”
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राम की है नगरी सारी,राम से ही काम है।
राम मेरे दिल में विराजे,राम शक्तिमान हैं।।

राम जी के नाम से,गूँजती हर एक दिशा।
राम से आरंभ है,और राम में हर अन्त है।।

राम से धरती गगन,जल हवा सब राम से।
राम है कण-कण समाए,राम ही विश्वास है।।

राम अपने हैं सखा एक,राम पालनहार हैं।
राम एक सर्वत्र सृष्टि,मेरे राम राजा राम हैं।।

राम मर्यादा के पालक,राम ही भगवान हैं।
राम माथे का तिलक,राम ही अभिमान है।।

राम एक धनुधर सुदर्शन,चक्र वाले राम हैं।
राम भूखे प्रेम के एक,शबरी के वो राम हैं।।

राम के ही नाम से,सांस चलती एक मेरी।
राम ही सुख-दुख हमारे,राम ही संसार है।।

राम करुणामय हमारे,राम सत्य प्रसार है।
राम ही है धैर्य मेरे,एक राम ही आधार है।।

निर्मल त्रिपाठी दिल्ली ✍️
सम्पर्क 9910988637