माता सीता केप्राकट्य दिवस पर:-

माता सीता केप्राकट्य दिवस पर:-

धरती की कोख से प्रकट हुई, पावन ज्योति सी आई,
जनक के आंगन में जैसे, खुद खुशियाँ मुस्काई।
सादगी में छिपा था वैभव, आंखों में था धाम,
सीता नाम अमर हुआ, संग जुड़ गया श्रीराम।

राजमहल की रानी बनकर, सुख सब उनके पास,
पर धर्म की राह चुनी, छोड़ दिया राज पाट
वन की राह में कांटे थे, फिर भी पति संग चली
पतिव्रता की मर्यादा ने, हर पीड़ा सही ।।

कठिन तपस्या सा जीवन जी ,हर दिन नई परीक्षा,
पर सत्य और प्रेम से जीती, हर अग्नि परीक्षा।
अपमानों की आंधी में भी, दीपक बनकर जली,
सीखा गई वो नारी को— शक्ति कभी नहीं डरी ।

लंका में भी बंदी होकर, हिम्मत ना हारी
रावण की हर चाल के आगे, चट्टान सी डटी रही ।
मन में केवल राम बसे थे, विश्वास अडिग, अटल,
सीखा गई कि सच्चा प्रेम, होता है निर्मल, सत्य ।

अयोध्या लौटकर भी जब, प्रश्न उठे सम्मान पर,
त्याग दिया फिर राजमहल,मर्यादा के नाम पर ।
वन में लव-कुश को देकर, संस्कारों की थाती,
मां बनकर भी निभा गई, हर पीड़ा मुस्काती।

अंत समय जब धरती ने, फिर से उन्हें पुकारा,
ममता की गोद में समा गई, नहीं कोई सवाल ।
त्याग, धैर्य, और सच्चाई की, बन गई वो मिसाल।

आज भी जिनसे सीख रहा, ये सारा ही संसार।
कठिन समय में जब हम आए , रखे धैर्य हरदम ।
सीता का जीवन कहता है— धर्म सदा महान,
त्याग से ही ऊंचा होता, हर इंसान का मान।

सहनशीलता ही शक्ति है, प्रेम ही सच्चा मार्ग,
जो इनको जीवन में अपनाए, उसका जीवन सीता माँ जैसा महान ।।

सीमा मुकुंद अग्रवाल
रायपुर छत्तीसगढ़