अभिवादन से अंत तक राम व्याप्त हैं,
राम नाम से ही हमें राम प्राप्त हैं,
राम जो अन्याय की दीवार को तोड़ें,
राम मित्रता भी दीन-हीन से जोड़ें,
तम में डूबी मानवता के राम नूर हैं,
राम जाति-धर्म के बंधन से दूर हैं,
ठुकरा दिए राम ने राजाओं के किले,
शबरी के बेर खाए और सुग्रीव से मिले।
सामाजिक समरसता के राम प्रतीक,
भाईचारे से रहने की देते हैं सीख,
राम के विरोधी सब हैवान हैं,
राम तो कण-कण में विद्यमान हैं,
हिन्दुस्तान में राम का नाम चलेगा,
राम मन्दिर यहां नहीं तो कहां बनेगा?
राम अपने देश में ही सियासत के शिकार हुए,
पर अब रामभक्तों के सपने सब साकार हुए।
इंसानी वेष में तुम दानव की भाषा मत बोलो,
सर्वव्यापी राम को जाति-धर्म में मत तोलो,
राम पर एक धर्म का अधिकार नहीं है,
ऐसा करने वालों को राम से प्यार नहीं है,
राम मरने में भी हैं, राम जीने में भी हैं,
जो राम को नहीं मानते, राम उनके सीने में भी हैं,
राम अहिंसा के प्रतिमान, दया की शाश्वत मूर्ति हैं,
सच्चे मन से पुकारो तो सब जरूरतों की पूर्ति हैं।
जाति-धर्म का भेद यहां खत्म होगा,
उम्मीद है राम मंदिर सबको हजम होगा,
निर्भय दिवस और सुख की रात मिलेगी,
अशिक्षा, बेरोजगारी, भूख से निजात मिलेगी,
राम को साथ में रखकर हर ताकत से तन जाएगा,
निश्चित ही मेरा भारत अब विश्वगुरु बन जाएगा,
हिन्दू हों या मुस्लिम, सब आपस में प्यार करें,
हम भारत के लोग, आओ राम को स्वीकार करें।
हम भारत के लोग,
आओ राम को स्वीकार करें।।
कवि: हरेन्द्र कुमार त्यागी
स्थान: आगरा, उत्तर प्रदेश
