श्री रामचरितमानस विधाता छंद

पुरातन ग्रन्थ ये अपना,
हमें जीना सिखाता है।

सिया श्रीराम-अमृत नित,
हमें पीना सिखाता है।।

चले जो दम्भ से तन के,
उसी की हार होती है।

जहाँ हैं शील मर्यादा ,
वहीं जयकार होती है।।


रहे आदर्श अंतस में,
वही तो राम है बनता ।

जपे जो राम की माला,
उसी का काम भी बनता ।।

नहीं आसान है मुख को,
सभी से मोड़ के जाना।

निभाने पितृ-वचनों को,
सुखों को छोड़कर जाना।।


डॉ अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर