सिया मुद्रिका हीरे की, राम नीलम नगीना हैं
सीता स्वयंवर देखने राम, लक्ष्मण,
गुरू विश्वामित्र जनकपुर पधारे हैं,
अयोध्या के राजकुमार हैं जानकर
नृप जनक ने उचित सत्कार किये हैं।
सब भाँति सम्मान अभिनन्दन कर
उचित निवास की व्यवस्था करी है,
नगर भ्रमण करने हेतु आज्ञा गुरू से
पा अनुज संग जनकपुरी देखी है।
प्रात:काल राम लक्ष्मण तहाँ पुष्प
वाटिका में जब आये पुष्प लेने हेतु,
सीता को सखियों संग माँ ने भेजा
मन्दिर में गौरी मैया के पूजन हेतु।
चंचल सुमुखि सयानी
सखी सिया जी की,
करत ठिठोली बोली,
देखे हैं कुवंर द्वै आली।
स्मृति न होत विस्मृत,
श्याम गौर वर्ण झंकृत है,
होत मेरो धीर चित्त अधीर
ज्यों वारि मध्य मत्स्य है।
वाणी सकुचानी सखी की
छाती ऐसे हुलसानी है,
कि ज्यों राज कुँवर ने
चित्त चोरी करि लीना है।
‘आदित्य’ मति उपमा
अलंकृत न्योछावर है,
सिया मुद्रिका हीरे की,
राम नीलम नगीना है।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ:22 जनवरी 2026
स्वरचित/ मौलिक
