प्राण प्रतिष्ठा राम की, दिवस मिला है सोम ।
जयकारो के साथ में, गूँज उठा है व्योम ।।
गर्भगृह में रामलला, मंदिर पावन धाम ।
दर्शन पाकर धन्य है, ऐसे है प्रभु राम ।।
भरत, शत्रुघ्न भ्रात हो, जिससे खुश थे राम ।
अनुज लखन भी कम नहीं, भाव रखे निष्काम ।।
शबरी आश्रम पर गये, लखन संग श्री राम ।
खाये झूठे बेर को, पहुँचाया निज धाम ।।
लीला न्यारी राम की, बाल रूप में आप ।
उनकी कृपा से हुआ, दूर अहिल्या शाप ।।
चरण पड़े जहाँ राम के, होते भव को पार ।
जो लगते उनके गले, सपने सब साकार ।।
सीता सौंपी अनल को, छिपी राज की बात ।
लीला कर गये जगत में,देकर दानव मात ।।
कुटिया मेरी धन्य हु़यी, जाग गये है भाग ।
भाव विभोर होकर कहा, खेलो मिलकर फाग ।
