** अवध आनंद **
दशरथ खुश हुए
अवध में राम हुए
गाजे बाजे बज रहे
बनती सुहारी हो।
नाच रहे जन-मन
अब नहीं कोई ग़म
अवध को मिलें हैं
अब त्रिपुरारी हो।
चारों भाई खेल करें
आपस में प्रेम धरें
कैकेयी मां लाड़ करें
सब पर वारी हो।
कौशल्या बलाएं करें
सिया राम डोर बंधे
चारों भाई ब्याह रचें
सुमित्रा दुलारी हो।
राम सिया वन गये
लाखन भी संग रहे
चौदह बरस तक
वन में गुजारी हो।
रावण कुमति लिए
सीता को कुदृष्टि किए
हनुमत सेना चली
करने सवारी हो।
विभीषण संग हुए
रावण का वध किए
लंका को विजय लिए
सब मनुहारी हो।
अवध तिलक करे
चंदन वंदन करे
सिंहासन धन्य हुआ
सब बलिहारी हो।
स्वरचित मौलिक रचना
अंजू विश्वकर्मा “अवि”
गोरखपुर,उ.प्र.।
