त्यागकर काज को छोड़कर काम को ।
आओ हम सब चले अब अवध धाम को ।
नाच गाकर मनायेंगे खुशियां वहीं ,
मिल रहा है भवन अब मेरे राम को ।
सैकड़ों वर्ष बीते रहे घर बिना ।
पा रहे थे सजा बिन सबब बिन गुना’ह ।
एक तिरपाल में दिन गुजारे फकत ,
सर की खातिर था सर पर खुला आसमां ।
धूप बारिश सही सर्द को भी सहा ,
क्या बयां मैं करुं उनके अंजाम को ।
नाच गाकर मनायेंगे खुशियां वहीं
मिल रहा है भवन अब मेरे राम को ।
काम जग के लिए कैकयी ने किया ।
अपने अपमान का भी ज़हर है पिया ।
शक्ति के बिन असुर बध असंभव सा था,
सो गईं वन लखन, राम के सॅंग सिया ।
वध किया है दशानन का पुत्रों सहित ,
जानता है जहां उसके परिणाम को ।
नाच गाकर मनायेंगे खुशियां वहीं ,
मिल रहा है भवन अब मेरे राम को ।
हम मुलायम रहे वो कड़े हो गए ।
नासमझ लोग कितने बड़े हो गए ।
जिनके दरबार में होता हर फैसला ,
वो खुदी इक अदालत खड़े हो गए ।
कर रहा है नमन आज रज्जन उन्हें ,
न्याय जिसने दिया न्याय के नाम को ।
नांच गाकर मनायेंगे खुशियां वहीं ,
मिल रहा है भवन अब मेरे राम को ।
✍️
रज्जन राजा
