*गीत*
युगों का काट कर वनवास,
आए धाम,वंदन है।
प्लावित मन है भावों से,
मेरे श्री राम,वंदन है।
चरण में शीश धर उनके,
हमे निष्पाप होना है।
पकड़ लें हाथ वे बढ़कर,
हृदय से ऐसे रोना है।
हमे करने यहांँ आए,
प्रभु निष्काम,वंदन है।
सकल ब्रह्मांड हर्षित है,
कण-कण जाप करता है।
ये पावन नाम है ऐसा,
सभी संताप हरता है।
त्रेता आया कलयुग में,
प्रतापी नाम,वंदन है।
जपो मन नाम की महिमा,
यही कलयुग में पूजा है,
मेरे धन राम हैं केवल,
नहीं कोई भी दूजा है।
कलुष हरते वो नारायण,
सुबह और शाम,वंदन है।
हैं दशरथ के वो नंदन,
कौशल्या के प्यारे हैं।
सुमित्रा और कैकयी की
आँखों के तारे हैं।
लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न भ्राता,
सियावर राम,वंदन है।
अहिल्या तारते,शबरी
के झूठे बेर खाते हैं,
केवट-सुग्रीव-विभीषण को,
गले से वो लगाते हैं।
हृदय हनुमान के बसते आठों याम,वंदन है।
खर-दूषण,कुंभकरण,
मेघनाद संहारक,।
हरी जिसने सिया माता,
उस रावण के उद्धारक।
अजानुभुज,कमल नयना,
रघुपति,राम वंदन है।
अखिल ब्रह्मांड में व्यापक,
वो तीनों लोक के स्वामी।
सुमिर मन मगन निस दिन तू,
वो घट-घट के अंतर्यामी।
व्याकुल आत्मा पाएगी,
तब आराम,वंदन है।
मंदिर छोड़कर भगवन्,
हमारे मन में तुम आओ।
जिव्हा पर नहीं केवल
इस जीवन में तुम आओ।
संँवर जाए भुवन सारा,
बनें सब राम,वंदन है।
युगों का काट कर वनवास,
आए धाम,वंदन है।
प्लावित मन है भावों से,
मेरे श्री राम,वंदन है।
अरुण कुमार ‘अरुण’ दिल्ली
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