है घोर विषय की चिंता मे, श्री हरी शिला पे बैठे है,
सूरज की किरणे शांत हो रही, उफ़न समंदर आता है,
पलकों पे ठहरे दो अश्रु, बहने की आज्ञा मांग रहे,
सिया विरह का राम प्रभु, खुद को ही दोषी जान रहे,
कैसे शत्रु का नाश करें, प्रसन्न करें कैसे शिव को,
ना सामग्री सब पूजा की, पुरोहित न्यूक्त करें किसको,
ज़ब नहीं उपाय मिला कोई, प्रभु ने अंगद को बतलाया,
चौथे पहर के अंतिम क्षण मे आज सभा को बुलवाया,
हे मित्र राज, हे महा बली, हे महाज्ञानी ये बतलाओ,
कैसे हो यज्ञ, कौन बने इत राम पुरोहित समझाओ,
जो परम पुजारी शम्भू का, वैष्णव कर्म का ज्ञाता भी,
जो पंडित हो महाज्ञानी, ये अनुष्ठान कर सके वही,
सिरहाने से रास्ता रोके, है खड़ा शत्रु का स्वर्ण महल,
एक छोर पर निर्जन वन है, बाकी दोनों पर जल ही जल,
इस दुविधा का सोच उपाय, बुद्धि चक्कर खा जाये,
मूक बने थे सभी सभा मे, ना समझ किसी के भी आये,
यज्ञ पुरोहित कौन बने ना दिखे आशा की एक किरण
किसको स्मरण करें रघुवर, जो आये राम पुरोहित बन
उम्मीद धुंधुली होती जाए, निशा हो रही थी बलवान,
शत्रु भूमि पर डटे थे वानर, कर के राम भरोसे प्राण,
ब्रह्मपुत्र, पुलस्त्य के भ्राता, रिश्ते मे रावण के दादा है,
जामवंत, रिछो के राजा, राम सभा मे औहदा पाते है,
सहस्त्र मनन कर बोले मै, मार्ग एक बतलाता हूं,
कठिन बहुत है रघुवर, आज्ञा फिर भी चाहता हूं,
इस समर धरा मे एक वही, गर आचार्य पद स्वीकार करें,
हो यज्ञ यथोचित पूर्ण तभी, निश्चित ही लंका विजय मिले,
है महापंडित, है शैव अडिग, है वैष्णव धर्म का ज्ञानी भी,
करो निमंत्रित रावण को, है कोई विकल्प अब शेष नहीं,
भर हुंकार लखन सुन बोले, प्रभु ये कैसी बातें करते हो,
महाज्ञानी हो आप पितृ सम, क्यों यज्ञ को मैला करते हो,
पंडित नहीं है, है खर वो, महा अधर्मी, अज्ञानी है
पर स्त्री का हरण किया वो कैसा शैव या वैष्णव है,
श्री राम चंद्र मंद मुस्काये प्रतिउत्तर कुछ भी दिया नहीं,
जामवंत को हाथ जोड़ कर नमन सभा मे किया तभी,
किया आग्रह जामवंत से, बन राम दूत स्वयं ही जाना,
विनती करना रावण से, इच्छा शिव की स्तुति बताना,
जामवंत जी सोच मे डूबे क्या बोलेंगे जा कर खर से,
सहमति की बात ही छोड़ो, आग्रह भी कैसे समक्ष रखे
सम्पूर्ण रात्रि इसी व्यथा मे, काटी कटे ना काटी जाये,
राम प्रभु की आज्ञा भी ऐसी, टाली टले ना टाली जाये,
पौत्र पुलस्त्य मुनि, पुत्र विश्रवा, मय दानव के जमाता है
परम वैष्णव, शिव भगत, धर्म, रीती – नीति के ज्ञाता है
जो बने पुरोहित शिव के थे, हाँ जिसने इंद्र को जीता है
लेकिन सत्य यह भी था कि वो खर अभिमानी रावण है
कुंभकरण देह सम स्वामी, आंखे जैसे जलते अंगार,
भयंकर रूप धरे जामवंत, जा पहुंचे थे लंका के द्वार,
भीषण गर्जन से रीछ राज की, काँप उठे दानव परिवार,
राह छोड़ सब अलग हुए, ज़ब जामवंत जी पहुँचे दरबार,
देख पितृ को सिंघासन तज, लंकेश लगे करने सत्कार,
आसान पहले दिया तात को, सब पूछा मंगल समाचार,
मुस्का कर जामवंत बोले, राजन आज नहीं हम तात,
दूत आज है राम चंद्र के, स्वीकार करो सादर प्रणाम,
सेतुः बंधन हुआ स्थापित अब विग्रह महेश लिंग चाहते राम,
आचार्य पद स्वीकार करो, करवाओ पूर्ण विजय अनुष्ठान,
सुन इतना रावण बोले, क्या लंका विजय है प्रयोजन?
सत्य वचन कह जामवंत ने किया आग्रह पुनः निवदेन,
ललकार उठी सेनानायक की बोले प्रहस्त नहीं स्वीकार,
भयंकर गर्जन से रावण ने निज मामा का किया प्रतिकार
गहन सोच मे डूबे रावण, दरबार मे था सन्नाटा छाया,
जैसे चेहरे के भाव बदलते, वैसे सभा की बदले काया,
प्रथम बार जीवन मे शत्रु ने रावण को ब्राह्मण माना है,
मेरे आराध्य के पूजन मे मुझे योग्य आचार्य जाना है,
है रावण इतना मुर्ख नहीं की ब्रह्मण धर्म से हट जाए,
ऋषि वशिष्ठ के यजमान का न्योता नाहक ही ठुकराये,
किन्तु क्या है राम भी, यजमान पद के अधिकारी,
क्षमा करो हे दूत पितृ सम, आप सुनो एक बात हमारी
कैसा हो जो तात आपको यही पे बंधन युक्त करें
ना लौटोगे वापस आप ना राम ही यज्ञ सम्पन्न करें,
बड़ी सरलता से रिछराज, बोले सुनलो राजन ध्यान धरे,
लखन सुमित्रा के नंदन, बैठे पशुपात अस्त्र संधान करे,
तनिक विलम्ब भी हुआ, अगर तो लंका पूरी मिटे अभी,
ना सोचो ना विचार करो, मुझे पहुचाओ सुरक्षित वहीं,
सुनकर मुख से जामवंत के, सब वीर बहादुर घबराये,
रावण के मस्तक पे चिंता, प्रहस्त पसीने मे भीगे जाये,
सम्भले रावण फिर बोल पड़े, यजमान को मैंने जांच लिया,
दूत संरक्षण आता उनको, आचार्यत्व मैंने स्वीकार किया,
तुरंत पठायो सेवक को, यज्ञ सामग्री का आदेश दिया,
पहुंचे खुद है अशोक वाटिका, माँ सीता से वृतांत कहा,
हो अनुष्ठान यजमान का पूरा, है आचार्य का धर्म यही,
बिना स्त्री के विवाहित नर, कर सकता कोई यज्ञ नहीं,
पुष्पक आये लेने तुमको, तुम बैठ समुद्र तट आ जाना,
ध्यान रहे तुम अधीन हो देवी पुनः लौटकर लंका आना,
वरुण देव का आवाहन कर, मा सीता ने स्नान किया,
त्रिजटा ने स्वच्छ वस्त्र दे, माँ को हेतु यज्ञ तैयार किया,
स्वामी के आचार्य को, माँ निज का आचार्य मान रही,
स्वस्थ कंठ से माँ जानकी कर रावण को प्रणाम रही,
दोनों हाथ उठा रावण ने, आशीर्वाद भरपूर दिए,
रावण अनुष्ठान करने पहुंचे माँ सीता को संग लिए,
आसमान से दिखे धरा की छटा बहुत ही प्यारी थी,
वानर सब अनुशाषित दिखे, ये माया कैसी न्यारी थी,
आना देवी आदेश मिले ज़ब, कह राम की ओर बढे,
पहुँचे सम्मुख राम के, जहाँ स्वागत मे भगवान खड़े,
हाथ जोड़ वनवासी राम, रावण को करने लगे प्रणाम,
सूर्य खड़े एक दूजे के सम्मुख, आभा ऐसी पडती जान
हाथ उठा कर स्वस्थ ह्रदय से बोले रावण दीर्घायु भव,
अचंभित हुए थे सभी वहां पर शत्रु से सुन विजयी भव,
भूमि पूजन कर ब्राह्मण बोले, भार्या बुलवाओ यजमान,
सम्भव नहीं सिया का आना, विनती करने लगे भगवान,
क्या कोई और विकल्प नहीं, हो बिना भार्या के अनुष्ठान,
हर एक वचन के साथ सूखते, जाते थे रघुनंदन के प्राण,
हे राम विवाहित हो तुम तो, बिन पत्नी कैसे हवन होगा,
हे रघुनंदन तुम हो विदुर नहीं, नाही भार्या का त्याग किया,
ऋषि विशिष्ट के शिष्य को तो, वेदों का होगा ही ज्ञान,
रावण कैसे वो यज्ञ करें, जहाँ होये नहीं रीती का मान,
आचार्य मुझ पे कृपा करो, दुविधा का शीघ्र करो उपचार,
सर्वज्ञ प्रभु कल्याण करो, मुझे लो संकट से अभी उबार,
हे ब्राह्मण आप परम ज्ञानी, कर कृपा मुझे कृतार्थ करो,
मेरी नौका है हाथ आपके, मुझे संकट सागर के पार धरो,
सुनो रघुवंश के राजा राम, मै आचार्य धर्म को कहता हूं,
लिखा हुआ जो शास्त्रों मे, उसको अनुकरण मे लाता हूं
जो सामग्री को लाने मे, यजमान सफल ना हो पाए,
आचार्य धर्म यही कहता, वो सँग मे अपने लेता आए,
पर ध्यान रहे रघुनंदन ये, मै आचार्य धर्म निभाता हूं,
यज्ञ उपरांत बची सामग्री, मै वापस लेता जाता हूं,
समुद्र तट विमान के भीतर, उपस्थित है देवी यजमान,
है राम अगर स्वीकार तुम्हे, लो बुलवा दे दो यथास्थान,
मौन भाव से शीश झुका, प्रभु ने युक्ति को मान लिया,
अश्रु भर नैनो मे यष्टि को, फिर बारम्बार प्रणाम किया,
चले विभीषण माँ को लाने, था राम प्रभु ने आदेश दिया,
चरण पड़े माँ के बालू पर, बढ़ लहरों ने था पखार दिया,
अर्धयजमान के दायें ओर फिर वैदही को बिठलाया,
गणपत पूजन, पूज नवग्रह, रावण ने सब समझाया,
शिव वंदन कर रावण ने, विग्रह लिंग आह्वान किया,
गत निशा के प्रथम प्रहर से, हनुमान उड़े थे लाने वह,
यजमान मुहर्त उत्तम यही, अविलम्ब कार्य को पूर्ण करो,
अर्द रेणुकाओं से भार्या सँग, विग्रह लिंग निर्माण करो,
फिर तीन लोक के स्वामी भी, कण बालू के थे संवार रहे,
मात सिया सँग कर कमलों से, कर लिंग विग्रह निर्माण रहे,
शिव लिंग स्थापना सम्पन्न हुई, पुष्पों की वर्षा करते देव,
जय सिया राम की जय लंकेश, जय जय शंकर जय महादेव,
पग छूकर आचार्य के, संकल्प दक्षिणा लेते राम,
बतलाओ हे आचार्यवर, कैसे आऊं आपके काम,
बोले रावण अंतिम क्षण मे, रहे उपस्थित सम्मुख राम,
दिया वचन रघुनन्दन ने कर पुनः नमन करबद्ध प्रणाम,
रामायण के महाकाव्य सा दूजा कोई काव्य नहीं,
मर्यादा का एक उदहारण, इस से कोई बड़ा नहीं,
बिना झूठ के बिना कपट के लड़ा गया ऐसा था युद्ध,
त्रेता युग के रामराज्य मे चहूँ दिश फैला बस था सुःख,
