वन-गमन

वन-गमन

चले राम, सीता, लखन आज वन को
भरत के लिए त्याग कर ताज वन को

निरख वेश-भूषा कुमारों का वल्कल
नहीं आ रही आज है लाज वन को

बड़ा क़र्ज़ है भूमि का राम पर भी
चुकाने चले उसका हैं ब्याज वन को

भले ही है साकेत जन्नत से बढ़कर
मगर मानते वो बड़ा राज वन को

हरण करनी है साधु-संतों की पीड़ा
चले राम-लक्ष्मण धनुष साज वन को

सभी देवता आज हर्षित हुए हैं
लगे भागने छोड़ रॅग-बाज वन को

कुशल-क्षेम जंगल का भी पूछते हैं
है भाने लगा उनका अंदाज वन को

साभार
ग़ज़ल रामायण से
रचयिता
गिरीश पाण्डेय “काशिकेय”
वाराणसी
मो. 9451229071