उर्मिला : मौन प्रेम (त्याग ,तपस्या ) के अनकहे अध्याय की अमर गाथा
रचनाकार : डा. शालिनी सिंह,कौशांबी
उर्मिला न वह वन में गईं, न राजपथ पर चलीं,
फिर भी विरह की अग्नि में प्रतिपल जलीं।
लक्ष्मण के संकल्प की बनीं आधार बनी ,
उर्मिला थीं प्रेम, धैर्य और त्याग का संसार बनी ।
चौदह वर्षों का लंबा विरह वीरांगना ने स्वीकार किया,
मायूस मुखदल की मुस्कान में हृदय का संताप पिया।
न कोई प्रश्न किया, न कोई प्रतिकार किया,
मौन रहकर समर्पण का विस्तार लिखा ,
जब लक्ष्मण वन में निद्रा से दूर रहे,
उर्मिला अयोध्या में विरह के संग रही
एक ने निभाया वन में सेवा का धर्म,
दूजी ने साधा मौन में प्रेम का मर्म।
उर्मिला को न यश की चाह, न सम्मान की अभिलाषा थी
न कोई शिकायत, न मिलने की परिभाषा थी,
उनके धैर्य में छिपी थी नारी की शक्ति,
उनके मौन में थी प्रेम की अनंत अभिव्यक्ति।
इतिहास में सीता के आँचल को सराहा गया,
पर उर्मिला के मौन ने भी युगों को राह दिखाया।
वह त्याग की प्रतिमा ही नहीं, स्वाभिमान की पहचान थीं,
अपने अंतर्मन की शक्ति से उर्मिला स्वयं में महान थीं।
हे उर्मिला! तुम्हारी तपस्या -त्याग को शत-शत प्रणाम,
तुमसे ही समर्पण को अर्थ मिला,
तुमसे से प्रेम त्याग बना ,
किसी के कर्तव्य में सहभागी होना प्रेम पर्याय हुआ।।
तुम रामकथा का वह अनकहा अध्याय हो,
जहाँ मौन भी बोल उठा है और विरह भी साधना बना,
तुम्हारा त्याग कोई विस्मृत कथा नहीं,
भारतीय नारी के आत्मबल की अमर गाथा बना ।।
— डा. शालिनी सिंह
