प्रदीप छंद गीत

प्रदीप छंद गीत
शीर्षक- मुझको कब इनकार है।

अतिशय प्रिय हैं चारों बेटे, मुझको कब इनकार है।
राजपाट बस मिले भरत को, उसका भी अधिकार है॥
दशरथ नन्दन राम। दशरथ नन्दन राम॥

खूब मंथरा पाठ पढ़ाए, बढ़ा रही मन खार है।
कोप भवन में बैठी रानी, किया नहीं श्रृंगार है॥
वचन कैकई माँग रही है, दशरथ भी लाचार है।
राजपाट बस मिले भरत को, उसका भी अधिकार है॥
दशरथ नन्दन राम। दशरथ नन्दन राम॥

राजा दशरथ पड़े सोच में, तर्क यह निराधार है।
भोर चढ़े ही राज तिलक है, चहूँ ओर चहकार है॥
बने राम बनवासी मेरा, रानी की ललकार है।
राजपाट बस मिले भरत को, उसका भी अधिकार है॥
दशरथ नन्दन राम। दशरथ नन्दन राम॥

प्राण बचाये थे तब तुमने, किए बहुत उपकार हैं।
कैसे भेजूँ उसे वनों में, सभी पुत्र इकसार हैं॥
वचन बद्ध हो राजन देखो, करना यह स्वीकार है।
राजपाट बस मिले भरत को, उसका भी अधिकार है॥
दशरथ नन्दन राम। दशरथ नन्दन राम॥

प्रण टूटे मंजूर नहीं है, रघुकुल की वह रीत थी।
वचन निभाया नृप ने अपना, रानी की यह जीत थी॥
दासी का सब किया धरा था, उस को ही धिक्कार है।
राजपाट बस मिले भरत को, उसका भी अधिकार है॥
दशरथ नन्दन राम। दशरथ नन्दन राम॥

कुसुम धीमान ‘कलिका’
पंचकूला हरियाणा (भारत 🇮🇳)