राम नाम का दीपक

राम नाम का दीपक

अयोध्या की गलियों से उठी जो इक आवाज़ थी,
वो दशरथ-नंदन नहीं, धर्म की परवाज़ थी।
कौशल्या की कोख से जन्मा वो इक राजकुमार नहीं,
सदियों की तपस्या का मिला हुआ आगाज़ था।

पिता के वचन पर राजपाट त्याग दिया,
भरत के प्रेम पर सिंहासन वार दिया।
वन-वन भटका, काँटों पर पाँव धरे,
पर मर्यादा की लकीर को पार नहीं किया।

शबरी के जूठे बेरों में अमृत पाया था,
केवट की नाव पर चरण धुलवाया था।
जो ऊँच-नीच का भेद मिटा दे, वो राम है,
जो हर दिल में प्रेम जगाए, वो राम है।

रावण के अहंकार को जिसने धूल चटाई थी,
धर्म की विजय पताका लंका पर लहराई थी।
पर सीता को लौटाकर भी अग्नि-परीक्षा ली,
क्योंकि राजा राम से पहले वो पुरुषोत्तम थे, प्रजा के रखवाले थे।

आज फिर कलयुग में जब अंधियारा छाने लगा,
भाई-भाई के खून का प्यासा होने लगा।
तब दिल कहता है, लौट आओ रघुराई,
फिर से मर्यादा का पाठ पढ़ाने, अयोध्या के कन्हाई।

राम मंदिर में नहीं, राम कर्म में बसते हैं,
राम शस्त्र में नहीं, राम धर्म में बसते हैं।
जिसके मन में करुणा, वाणी में सत्य बसे,
समझो उसके घट-घट में खुद श्री राम बसे।

तो बोलो जय श्री राम, पर काम भी राम वाले करो,
वचन के पक्के बनो, और दिल में सबके लिए प्रेम भरो।
यही है राम राज्य की असली परिभाषा,
यही है अमन रंगेला की कलम की अभिलाषा।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)