विषय :- अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा
सदियों की प्रतीक्षा ने आज
माथे पर तिलक सजाया है,
आँसू नहीं, आस्था झरती है
हर हृदय ने राम को पाया है।
अयोध्या की गलियों में आज
इतिहास ने दीप जलाए हैं,
वन-वन भटके जिनके चरण
वे घर लौटकर मुस्काए हैं।
टूटे स्वप्नों की ईंटों से
जो धैर्य ने मंदिर गढ़ा,
वो केवल पत्थर नहीं बना
वो विश्वास बनकर खड़ा।
नारे नहीं, शोर नहीं
बस मौन में गूँजी श्रद्धा,
राम नाम की धड़कन में
जुड़ी है हर भारत की व्यथा।
ये जीत किसी एक की नहीं,
न हार किसी और की है,
ये तो उन आँखों का सपना है
जहाँ राम बसते हैं, वही अयोध्या है।
आज सिंहासन पर नहीं
हृदयों में राम विराजे हैं,
प्राण-प्रतिष्ठा केवल मूर्ति की नहीं
भारत की आत्मा के काजे हैं।
नेहा कुमारी
