प्रभु श्री राम का भाव सबकी स्थिति के अनुसार व्यवहार में उतरे इसी कामना के साथ प्रकट विशेष भाव।
राम नाम जपना लगे, सबको अति आसान।
प्रभो राम गुण भावना, व्यापे अंतर आन।।
राम सरीखे सुत बनें, हो भ्रातृत्व स्वभाव।
मित्र बनाये भाव से, तजि सब भेद प्रभाव।।
जीवन में पालन करें, एक पत्नी व्रत धर्म।
संतो को सम्मान दें, लहें ज्ञान गुण मर्म।।
सहज ढंग से सह सकें, कटु स्वभाव दुर्भाव।
सबके प्रति अक्षुण रखें, शुभ सम्मान लगाव।।
वचन और संकल्प पर, दृढ़ता हो पुरजोर।
उसे निभाने में कहीं, छोडे़ं कसर न कोर।।
सदा रहें सामान्य खुश, भले समय प्रतिकूल।
अपने पर ले लें स्वयं, अन्य दोषगत भूल।।
राजा हो जो रख सके, प्रजा भाव का मान।
प्रिय पत्नी को ही भले, हो दुख कष्ट महान।।
आये स्मृति राम जब, जो दशरथ के लाल।
पुत्र भ्रात पति मित्र नृप, छवि उर करे निहाल।।
भाव तथा ‘आत्रेय’ गुण,जो, प्रभु श्री राम विचार।
अपनायें व्यवहार जन, हो समाज उद्धार।।
भाव अभिव्यक्ति
गंगा प्रसाद यादव ‘आत्रेय’
सुलतानपुर उ प्र
