श्री राम :११ दोहे
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गौर-वर्ण दैदीप्य-मन , अतिशय मृदुल उदार ।
दुष्टों के संहार हित, लिए राम अवतार ।
करुणामय श्री राम हैं, राम-हि तारणहार ।
राम सखा हैं, मित्र हैं, राम-हि प्रेम फ़ुहार ।
केवट से की मित्रता, किया शिला उद्धार ।
दण्ड दिया हर दुष्ट को, भक्तों को उपहार ।
राम नाम की लौ लगी, जिनको बारम्बार ।
वे जन उतरे प्रेम से , वैतरणी के पार ।
वाल्मीकि जी रच गए, राम कथा अविराम ।
हनुमत के भी राम हैं, तुलसी के भी राम ।
कितने भक्तों ने किया, बरसों अथक प्रयास ।
राम लला को मिल सका, तब अपना आवास ।
रावण के वंशज सभी, बरसों रहे विरुद्ध ।
कलियुग में लड़ना पड़ा,पुनः राम को युद्ध ।
राम-राम कह कर तरे , देव-असुर नर-नार ।
राम नाम की विश्व में , महिमा अनत अपार ।
जिसने मन से थाम ली, राम-नाम पतवार ।
भव-सागर से हो गया, उसका बेड़ा पार ।
नर-नारी सब स्वस्थ हों, भरा रहे धन-धान ।
राम-राज का मूल है, सब जन एक समान ।
भारत है श्री राम का , हैं भारत के राम ।
शक्ति-पुंज श्री राम को , बारम्बार प्रणाम ।
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मूल रचना: डॉ मनोज अबोध
ग्रेटर नोएडा-201310(उ॰प्र॰)
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