राम पर कितना लिखूं मैं राम को कितना पढूं मैं।
राम सबके हैं रचयिता राम को कितना रचूं में।।
राम को बाहर तलाशा
पत्थरों को भी तराशा।
वन गमन भी कर लिया है
पर हृदय है अब भी प्यासा।
हैं गढ़ा जिसने सभी को आपको कितना गढ़ूं मैं।
राम सबके हैं रचयिता राम को कितना रचूं में।।
भक्ति की मिट्टी को रुंदा
मन की भट्टी में पकाए।
नेह की बाती बनाई
भाव के घृत भी ले आए।
दीप लाखों हैं जलाए और क्या अर्पण करूं मैं।
राम सबके हैं रचयिता राम को कितना रचूं में।।
मैं नहीं शबरी हूॅं कोई
बेर जुठे जो खिलाऊं।
सब्र इतना है नहीं जो
जन्म भक्ति में लगाऊं।
हे प्रभु अब आ भी जाओ धीर कितना ही धरूं मैं।
राम सबके हैं रचयिता राम को कितना रचूं में।।
हरेंद्र हर्षित ✍️
