राम बसे चहुँ-ओर

राम बसे चहुँ-ओर मगर हम ढूँढे अपने अंदर राम
शायद हो पाएँगे हमसे फिर थोड़े से बेहतर काम
लोग कई हैं ख़ास यहाँ पर लेकिन अपना ईश्वर आम
याद जिसे कर सकते हैं बिन जाए कहीं बिन देकर दाम

हर मन पावन हर दिल निर्मल हर घर हो इक सुंदर धाम
काश सँवर जाए ये दुनिया काश चराग़ां हों दर बाम
काश कि सच्चाई अच्छाई की जानिब उट्ठे हर गाम
हम ये दुआ करते हैं “ज़र्रा” राम तुम्हारा लेकर नाम

– सुश्रुत पंत ज़र्रा